Tuesday, 6 January 2009

विषय-सूची


Thirukkural in Sanskrit
तिरुक्कुरळ् - संस्कृतानुवाद्


 तिरुक्कुरळ् - संस्कृतानुवाद्
THIRUVALLUVAR'S
THIRUKKURAL
IN
SANSKRIT SLOKAS
BY
S.N. Srirama Desikan, Siromani

WITH AN INTRODUCTION BY
Dr. C.P. Ramaswamy Aiyar


विषय-सूची
भाग: धर्मकाण्ड:
1. ईश्वरवन्दनम्
6. पत्नी
2. वृष्टिमहिमा
7. पुत्रभाग्यम्
3. यतिवैभवम्
8. प्रीति:
4. धर्मवैशिष्ट्यम्
9. अतिथिसत्कार:
5. गार्हस्थ्यम्
10. मधुराला:
11. कृतज्ञता
16. क्षमा
12. ताटस्थ्यम्
17. अनसूयता
13. निग्रहशीलता
18. अलोभ:
14. सदाचारसंपत्ति:
19. परोक्षनिन्दावर्जनम्
15. परदारपराङ्मुखता
20. वृथालापनिषेध:
21. दुष्कर्मभीति:
26. मांसवर्जनम्
22. लोकोपकारिता
27. तप:
23. दानम्
28. दुराचार:
24. कीर्ति:
29. चौर्यनिषेध:
25. दया
30. सत्यवचनम्
31. क्रोधविजय:
35. सन्यास:
32. अपकारत्याग:
36. तत्वज्ञानम्
32. अपकारत्याग:
36. तत्वज्ञानम्
33. अवध:
37. निराशा
32. अपकारत्याग:
36. तत्वज्ञानम्
33. अवध:
37. निराशा
38. विधि:


भाग: अर्थ-काण्ड:
अध्याय 039to 050

39. 
40. 
41. 
42. 
43. 
44. 
45. 
46. 
47. 
48.


49. 
50. 

अध्याय 051 to 060
51. विभृश्यविश्वसनम्
56. अनीत्यापालनम्
52. विमृश्य कार्यकरणम
57. निर्भयत्वन्
53. बन्धुप्रीति
58. दाक्षिण्यम्
54. अविस्मरणम्
59. चारप्रेषणम्
55. नीतिपरिपालनम्
60. उत्साहसम्पत्ति:
61. आलस्याभाव
66. क्रियाशुद्धि
62. प्रयत्नशीलत्वम्
67. क्रियादाढर्यम्
63. औत्सुक्यम्
68. कार्याचरणप्रकार:
64. अमात्य:
69. दौत्यम्
65. वाग्मित्वम्
70. राजसेवा
71. इङ्गितपरिज्ञानम्
76. अर्थार्जनोपाय:
72. सभास्वरूपम्
77. सैन्यप्रयोजनम्
73. सभाकम्पविहीनता
78. सेनादार्ढ्यम्
74. देश्:
79. स्नेह:
75. दुर्ग:
80. स्नेह्अपरीक्षा
81. प्राक्तनस्नेह:
86. भेदबुद्ध:
82. निर्गुणजनमैत्री
87. शत्रुनिर्णय:
83. आन्तरस्नेहशून्यता
88. विरोवतत्त्वपरिज्ञानम्
84. मौढ्यम्
89. आन्तरवैरम्
85. अल्पज्ञत्वम्
90. महात्मनिन्दानिराकरणम्
91. भार्यानुवर्तनम्
96. कुलीनत्वम्
92. पण्याङ्गना
97. मानम्
93. मद्यपाननिषेध:
98. महत्त्वम्
94. द्यूत:
99. विशिष्टगुणसम्पत्ति:
95. औषधम्
100. अनुसृत्य प्रवर्तनम्
101. निरर्थकं वित्तम्
105. दारिद्र्यम्
102. लज्जाशीलता
106. याचना
103. कुलगौरवरक्षणम्
107. याचनाभीति:
104. कृषिकर्म
108. नीचत्वम्

भाग: काम-काण्ड:
109. दर्शनंवितर्कश्च तिरुक्कुरळ्
115. अपवादकथनम्
110. भावपरिज्ञानम्
116. वियोगसहनम्
111. सम्भोगसुखम्
117. वियोगदु:खानुभव:
112. लावण्यमहिमा
118. नायकदिदृक्षामृलकखेद:
113. प्रेमप्रभावकथनम्
119. वैवर्ण्यमूलकव्यसनम्
114. निर्लज्जात्वकथनम्
120. वियोगव्यसनाधिक्यम्
121. अनुभृतसुखं स्मृत्वा रोदनम्
128. अभिज्ञाननिवेदनम्
122. दृष्टस्वप्नकथनम्
129. संभोगत्वरा
123. सायङ्कालदर्शनेन खेद:
130. मनसि निर्वेद:
124. अवयवसौन्दर्यहानि:
131. विप्रलम्भ:
125. मनस्येव कथनम्
132. विप्रलम्भरहस्यम्
126. धैर्यहानि:
133. विप्रलम्भसुखम्
127. कामुकयोरन्योन्यव्यसनम्



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